प्रमाण| गढ़वाली और कुमाउनी बोली नहीं ‘भाषा” हैं |

गढ़वाली और कुमाउनी भाषा नहीं बोली हैं| ऐसा तर्क देने वाले आपने बहुत से गढ़वाली या कुमाउनी लोग देखें होंगे| हो सकता है आप भी यही मानते होंगे और यह भी हो सकता है की आप इसे सिरे से खारिज कर दे| उत्तरखंड की जनसँख्या लगभग 1 करोड़ है और इन 1 करोड़ लोगों की आबादी वाले प्रदेश में हिंदी और संस्कृत ही आधिकारिक भाषाएँ हैं|आज हम आपको कुछ ऐसे ही कारण बताने वाले है जिनके पढ़ कर आप भी महसूस करेंगे गढ़वाली या कुमाउनी भाषाएँ हैं बोली नहीं|

जनसँख्या

बहुत से कुतर्क देने वालो का कहना है की गढ़वाली और कुमाउनी भाषा बोलने वाले लोग बहुत कम है  किन्तु वे इस बात का कोई प्रमाण नहीं देते| हम कुछ ऐसे ही प्रमाण देने वाले है| सेन्सस  के अनुसार गढ़वाली बोलने वालों की संख्या लगभग 3० लाख है और लगभग इतने ही लोग कुमाउनी जानते है| भारतीय संविधान के अनुछेद 8 के अनुसार देश में 22 भाषाएँ हैं इनमे से एक भाषा है मेइतेइ जो की उत्तर पूर्व भारत के राज्य मणिपुर में बोली जाती है, मणिपुर की कुल जनसँख्या ही 27 लाख है और लगभग 12 से 15 लाख लोग इस भाषा का इस्तेमाल करते है| अगर मेइतेइ को भाषा घोषित किया जा चूका है तो गढ़वाली या कुमाउनी को क्यों नहीं??

यह भी पढ़ें:

भारतीय चुनाव से जुड़े कुछ अविश्वनीय तथ्य जिन्हें आपने पहले कभी नहीं सुना होगा

उत्तराखंड की प्रसिद्ध महिलाएं जिन्होंने विश्व में मनवाया अपना लोहा

लिपि

एक तर्क यह भी है गढ़वाली या कुमाउनी की कोई अपनी लिपि नहीं है तो आपको बता दे ये भाषाएं देवनागरी में लिखी जा सकती हैं बहुत सी ऐसी भाषाएँ हैं जो देवनागरी में लिखी जाती हैं जैसे  संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि| मैथिली, संथाली, संस्कृत, हिन्दी, मराठी, बोडो, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली आदि भाषाएं तो भारतीय संविधान के अनुछेद 8 में समिलित भी की गयी है| इंग्लिश, फ्रेंच आदि भासह्यें भी रोमन में लिखी जाती है ऐसे में गढ़वाली भी अगर देवनागरी में लिखी जाए और भाषा का दर्जा दे दिया जाए तो इसमें कुछ नया नहीं होगा|

अलग अलग रूप

ऐसा भी मानना है की गढ़वाली या कुमाउनी अलग अलग रूप में बोली जाती है और बहुत कम दुरी पर ये भाषाएँ बदलती रहती हैं| गढ़वाली ही अलग अलग प्रकार की होती है जैसे बधाणी, सलाणी, बंगानी, राठी, नागपुरिया आदि| लेकिन बहुत सी भाषाएँ भी क्षेत्रानुसार बदलती है जेसे बंगाली, असमी आदि| भाषा का बदलना क्षेत्र के भोगौलिक स्थितियों पर निर्भर करता है| ऐसे में गढ़वाली या कुमाउनी अन्य भाषाओं से अलग नहीं है|

क्या कारण है गढ़वाली या कुमाउनी भाषा के लिए संघर्ष नहीं होता?

1. युवाओं में जागरूकता की कमी: उत्तराखंड की भाषाओं के संरक्षण और प्रसार का कोई साधन नहीं है ऐसे में युवा अपनी भाषा को लेकर जागरूक नहीं हैं| गढ़वाली और कुमाउनी सिनेमा भी बहुत कुछ ख़ास नहीं कर पाते| जिससे युवा अपनी भाषा ही नहीं जान पाते|

2. सांस्कृतिक प्रवास – वैश्वीकरण के इस युग में, लोग विदेशी भाषाओं सहित अधिक लोकप्रिय भाषाओं की ओर बढ़ रहे हैं। यह एक बुरी चीज नहीं है, लेकिन अन्य राज्यों की तरह जहां लोग कई भाषाई दृष्टिकोण बनाए रखने में विश्वास करते हैं, उत्तराखंड और बुरी तरह विफल हो जाता है जब अपनी भाषा बोलने या लिखने की बात आती है।

3. न्यूनतम प्रसार – ऐसी कोई भी किताब ऑनलाइन नहीं है जो ये भाषाएं सिखा सकती हैं। हैं भी अगर तो मिलनी बहुत मुश्किल हैं क्योंकि उनकी मात्र ही बहुत कम है, इसके अलावा हमारे पास गढ़वाली और कुमाउनी को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए उचित योजना भी नहीं है। जिससे बच्चे ये भाषाएँ नहीं सीख पाते|

4. कमजोर नेतृत्व – हमारी सरकार का नेतृत्व बहुत कमजोर है और ना ही लोक सभा में उत्तराखंड का विशेष योगदान है ऐसे में बिना दृढनिश्चय और बिना पालिसी बनाये हमारी भाषा का उत्थान नहीं हो सकता|

उम्मीद है आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी| हमे अपनी भाषा के उत्थान के लिए कुछ करने की बेहद जरुरत है| आपकी क्या राय है इस बारे में हमे जरुर बताये|

REALTED

क्या है आर्टिकल 370 और क्यों हटाना जरुरी हो गया है इसे कश्मीर से??

गढ़वाल राइफल के मेजर पर ऍफ़ आई आर | पूरी कहानी | सरकार है जिम्मेदार?

इतिहास में उत्तराखंड का इन नामों से है उल्लेख

 

Please follow and like us:

About the Author

PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *