तीलू रौतेली कहलाती हैं गढ़वाल की लक्ष्मी बाई, पढ़िए ऐसा क्या किया इन्होने

15 वर्ष की आयु में कोई क्या कर सकता है? इस बात का जवाब देती है गढ़वाल की वीरांगन तीलू रौतेली की कहानी। 15 वर्ष की अल्पायु में युद्ध भूमि में कूदने वाली वीरांगना थी तीलू रौतेली। तीलू ने दुश्मन को छटी का दूध याद दिला दिया था। सात वर्ष तक युद्ध भूमि में शत्रु के दांत खट्टे करने वाली महिला थी तीलू रौतेली।  तीलू रौतेली हमेशा ही युद्ध भूमि में अजेय रहीं, उनके युद्ध कौशल का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि युद्ध भूमि मुन्हे कोई हर नही सका और उनको एक कत्युरी सैनिक ने छल से मारा था।

तीलू रौतेली का जन्म चान्द्कोट परगना के गुरांड गाँव में भूप सिंह के घर में हुआ। तीलू से बड़े दो जुड़वाँ भाई थे जिनका नाम भगतु और पथवा था। तीलू के पिताजी भूप सिंह गढ़वाल नरेश में सेना में थोकदार थे। तीलू बचपन से एक कुशाग्र बालिका थी, उसने बचपन में ही तलवार चलाना और बन्दुक चलाना सीख लिया था। 15 वर्ष की आयु में तीलू की सगाई इडा गाँव के भुप्पा सिंह नेगी से हो गयी थी।

उन दिनों गढ़वाल के अधिकाँश क्षेत्र में कत्युरी राजा धामशाही का कब्जा था।  कहा जाता है कि राजा धामशाही एक क्रूर राजा था और जनता पर अत्यधिक कर लगाया करता था। गढ़वाल के राजा और कत्युरी राजा अक्सर आपस में युद्ध किया करते थे। ऐसी ही एक युद्ध में तीलू के भाई, पिता और मंगेतर शहीद हो गये। तीलू ने इसके बाद शादी ना करने की ठानी।

गढ़वाल और कौथिग का बहुत पुराना साथ है और उत्तराखंड की एक ख़ास विशेषता कौथिग भी हुआ करते हैं। उन दिनों कांडा गाँव में कौथिग लगा करता था, आज भी वह कौथिग लगता है पर आज वह कौथिग तीलू रौतेली की याद में लगता है। बालिका तीलू का भी मन उस कौथिग में जाने का हुआ। तो तीलू कौथिग में जाने की जिद करने लगी। माँ ने ताना मारते हुए बोला की “कौथिग जाने के बजाय तुझे अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की मौत का बदला लेना चाहिए। अगर तू धामशाही से बदला लेने में सफल रही तो जग में तेरा नाम अमर हो जाएगा। कौथिग का विचार छोड़ और युद्ध की तैयारी कर। ”  माँ की बात सुन तीलू के दिल में बदले की आग जलने लगी लगी, वो अपने पिता और भाइयों की मृत्यु का बदला लेना चाहती थी। तीलू ने गाँव के और आस पास के इलाके के युवाओं को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।  तीलू ने अपनी सेना बनानी आरम्भ कर दी जिसकी सेनापति वो स्वयं बनी। तीलू का साथ दिया उनकी दो सहेली बेलू और पत्तू ने, उनके साथ उनकी घोड़ी बिंदुली भी थी।

तीलू ने कालागढ़ से से अपने अभियान की शुरुवात की और अगले साल तक दुश्मन को हर जगह परास्त किया। राजा धाम शाही से परेशान जनता ने तीलू का भरपूर साथ दिया। उन्होंने साथ साल के अंदर चौखुटिया तक गढ़वाल की सीमा निर्धारित कर दी। सात साल तक चले इस युद्ध में में तीलू ने कालागढ़, इडियाकोट, टकोलीखाल, सरैखेत, कालिंकाखाल और बीरोंखाल आदि जगहों को कत्युरी राज से मुक्त कराया।

बीरोंखाल के युद्ध के बाद तीलू ने वहीँ कुछ समय आराम करने की सोची।  तीलू की सेना ने नयार नदी के किनारे को आराम करने के लिए चुना। रात्री को सब के सो जाने के बाद तीलू अकेली ही नदी में नहाने चली गयी और मौके का फायदा उठाते हुए एक कत्युरी सैनिक रामू रजवार ने पीछे से आकर तीलू पर हमला कर दिया, जिससे तीलू के प्राण उठ गए| 22 वर्ष की अल्पायु में तीलू का देहांत हो गया।

आज भी उनकी याद में कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र में हर वर्ष कौथीग (मेला) का आयोजन  किया जाता हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है। तीलू रौतेली की याद में उत्तराखंड सरकार द्वारा बेटियों को “तीलू रौतेली पुरस्कार” भी दिया जाता है।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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