बदरीनाथ धाम हुआ करता था पहले तिब्बत में | भगवान भाग कर आये उत्तराखंड

तिब्बत और हिमालयी राज्य हिमांचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के पौराणिक समय से ही गहरे सम्बन्ध रहे हैं| इन राज्यों और तिब्बत में बहुत सी समानता देखने को मिलती रही है| शंकराचार्य के उत्तर भारत में आने से पूर्व इस क्षेत्र में बोद्ध धर्मं का बोल बाला था| इसी कारण अब तिब्बत और उत्तर भारत के रीती रिवाज, खान पान में काफी समानता है| आज हम आपको धर्म से जुडी इस समानता के बारे में बताएंगे की तिब्बत में बोद्ध धर्म और भारत में हिन्दू धर्मं में कितना कुछ सामान है| और कई लोगो का तो यह भी मानना है की बद्रीनाथ धाम पहले तिब्बत में हुआ करता है|

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तिब्बती चित्रकारी में काफी प्रमाण मिलते है की कैसे हिन्दू और बौद्ध धर्म में समानता है| तिब्बती चित्रकारी में त्रिलोचन या चान-सुम-पा का किरदार काफी देखने को मिलता है| त्रिलोचन का शरीर नीले रंग का एवं उसने बाघ की खाल के वस्त्र धारण किये होते हैं| उसके कमर पर सांप लटका होता है| एक हाथ में वज्र और एक हाथ में तलवार दर्शायी जाती है| काली का भी चित्रण भी तिब्बती चित्रकारों द्वारा किया गया है| हालांकि काली को लाल रंग का दिखाया गया है| 

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बहुत से तिब्बती लोग भगवान विष्णु की भी पूजा करते है| लदाख बॉर्डर के पास तिब्बत में स्थित थोलिंग मोनेस्ट्री में भगवान श्री बदरीनाथ की एक विशाल प्रतिमा है और साथ की माँ काली की प्रतिमा भी देखने को मिल जाती है| बदरीनाथ के पास बॉर्डर के आस पास बसे लोगों की माने तो भगवान बद्रीनाथ थोलिंग से भाग कर अपनी वर्तमान जगह पर आये थे|

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ऐसा माना जाता है की बदरीनाथ मंदिर का नाम थोलिंग मठ था जो कि सतलज नदी के तट पर स्थित था| वहां के पुजारी जिनको लामा कहा जाता है उस जगह की शुद्धता का ख्याल ना रखते हुए, वहां मांस का सेवन करना शुरू कर दिया था| जिस कारण वह जगह गन्दी हो गयी जिसकी सफाई भी नहीं की जाती थी| ऐसे में भगवान वह जगह छोड़ अलकनंदा नदी के तट पर बस गए| ऐसा भी कहा जाता है वह रास्ता जहाँ से बद्रीनाथ गए थे, वहां निशान अभी भी देखने को मिल जाते हैं|

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आज भी जब श्री बदरीनाथ के कपाट खुलते हैं थोलिंग गोम्पा के पुजारियों की तरफ से मंदिर में एक पत्र पहुँचता है जिसमे बद्रीनाथ के लिए लिखा जाता है, “हमारे अपने भगवान”|

यह मात्र किवदंतियां हैं और कितनी सची और कितनी झूठी है इस बात का कोई प्रमाण नहीं है| यह पोस्ट खेमानंद चंदोला जी की लिखी पुस्तक “अक्रॉस द हिमालयाज थ्रू द अजेस” के अनुसार लिखी गयी है| मध्य हिमालय और पश्चिमी तिब्बत के सम्बन्ध के बारे में इस पुस्तक में बखूबी बताया गया है|

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PRIYANSHU JAKHMOLA

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