26/11 के मुंबई हमले में उत्तराखंड के इस वीर सपूत को मिला था “अशोक चक्र” | पूरी जानकारी

भारत की धरती पर सबसे भयावह आतंकवादी हमलों में से एक 26/11 के आतंकवादी हमले में, 166 लोग मारे गए थे और 300 से ज़्यादा घायल हो गए थे, जब पाकिस्तान से दस भारी-सशस्त्र आतंकवादियों ने मुंबई में अरब के सागर के रास्ते घुसकर हिंसा फैलाई। इसे भारत का 9/11 भी कह सकते है| हालांकि भारत के लोगों ने अधिक दृढ़तापूर्वक हिंसा की घटनाओं को स्वीकार किया| इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर ऐ तय्ब्बा के प्रमुख हाफिज सईद ने ली थी| I C 814 की घटना के दौरान हाफिज को छोड़ा गया था|

इस घटना में हमारे सुरक्षा बलों ने बहादुरी का परिचय दिया| NSG कमांडोस की युद्ध शैली की तारीफ़ हुई| ऐसे में उत्तराखंड के एक वीर ने भी अपने साहस और पराकर्म से आंतकवादियों के दांत खट्टे किये, उनका नाम था हवलदार गजेन्द्र सिंह|

हावलदार गजेंद्र सिंह बिष्ट (36) एक एनएसजी कमांडो थे जो 2008 के मुंबई हमलों के दौरान ऑपरेशन ब्लैक टर्नाडो का हिस्सा थे। वह वास्तव में एक अज्ञात नायक थे जिन्होंने रणभूमि में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए| उन्हें 26 जनवरी 2009 को उनके बहादुर कार्यों के लिए अशोक चक्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

हवलदार सिंह उत्तराखंड के एक छोटे से गांव गणेशपुर से थे। वह 1991 में गढ़वाल राइफल्स में शामिल हुए, जिसके बाद एनएसजी कमांडो बनने से पहले वे 10 पैरा एस एफ (विशेष बल) का भी हिस्सा बने|

हवलदार गजेन्द्र दिल्ली में रह रहे थे जब वे मुंबई ऑपरेशन के लिए गए। 26 नवंबर की रात को, सिंह को एक आपातकालीन स्थिती के बारे में  कॉल प्राप्त हुई और तुरंत वे यह कहकर चले गए कि वह थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे। गंजेंद्र ने अपने आवश्यक चीजे उठाइ, उनके परिवार को बाद में बताया गया कि उन्हें वहां मुंबई भेज दिया गया है।

गजेन्द्र सिंह नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप और एनएसजी कमांडो की इकाई का हिस्सा थे, जिन्हें नरीमन हाउस के अंदर आतंकवादियों को नेस्ता नाबुत के लिए भेजा गया था। आतंकवादियों ने इमारत में कम से कम छह बंधकों को पकड़ा था और कमांडो की इकाइयों ने उन्हें बेअसर करने के लिए छत पर तेजी से दबदबा बनाया।

एनएसजी के महानिदेशक ज्योति कृष्ण दत्त के अनुसार, सिंह की अगुआई वाली टीम आतंकवादियों के साथ गहन क्रॉस फायरिंग में शामिल हो गई थी। अपने कमांडो के साथ पीछे हटने के बजाय, गजेन्द्र सिंह ने आगे बढ़ते रहने का फैसला किया, तब भी जब उग्रवादी हथगोले फेंकने लगे।

उग्रवादियों की गोलियों के निरंतर शॉट्स भी उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोक पाए और अपने साथीयों को कवर करने में वे कामयाब रहे, लेकिन अंततः वे अपनी कई गोलियों के शिकार हो गए। हालांकि, उनके शौर्य और पराकर्म की वजह से ही उनके साथी उग्रवादियों को मारने में कामयाब हो पाए|

गजेंन्द्र सिंह जेसे कई वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी और पाकिस्तान  से आये उन उग्रवादियों के मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया|आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। न केवल यह भारत के लिए एक खतरा है, बल्कि पूरे विश्व के देशों के लिए है।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

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