उत्तराखंड सपूत जिन्होंने जीते सर्वोच्च बहादुरी पुरस्कार

उत्तराखंड की भूमि ने बहुत से वीर योद्धा दिए हैं चाहे हम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की बात करें या महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत की, उत्तराखंड ने कई वीर दिए हैं जिन्होंने अपना लोहा संपूर्ण विश्व में मनावाया| आज हम आपको उत्तराखंड के उन वीर योद्धाओं के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने अपनी बहादुरी के लिए देश के सर्वोच्च सम्मान (gallantry awards) जैसे महावीर चक्र (mahaveer chakra), अशोक चक्र (ashok chakra) आदि अर्जित किये|

मोहन नाथ गोस्वामी:

मोहन नाथ गोस्वामी उत्तराखंड के एक वीर सपूत थे जो की 9 पैरा की छठी बटालियन में थे| कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में सितम्बर 2015 को उनकी और उनके साथियों की मुठभेड़ आतंकियों से हो गई जहां बड़े साहस और वीरता से गोस्वामी ने अपने घायल साथियों को बाहर निकालने में मदद करी और अकेले 2 उग्रवादियों को ढेर कर दिया| उन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर करने से पहले 11 दिन में 10 आतंकियों को ढेर कर दिया| भारत सरकार ने उन्हें 2016 में मरणोंपरांत शान्तिकाल का देश का सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया|

जसवंत सिंह रावत:

जसवंत सिंह रावत 4 गढ़वाल राइफल्स, उत्तराखंड के एक भारतीय राइफलमेन सिपाही थे जिन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश में नूरानंग की लड़ाई में मरणोपरांत महा वीर चक्र जीता था। उनका जन्म 1 9 अगस्त, 1 9 41 को श्री गुमान सिंह रावत के घर में गांव बैरुन, पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। उन्होंने युद्ध में 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मार डाला|

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गब्बर सिंह नेगी:

गब्बर सिंह नेगी का जन्म 21 अप्रैल 1895 को उत्तराखंड के टिहरी जिले के मंजूड गाँव में हुआ था| गब्बर सिंह मात्र 17 साल की उम्र में सेना में भारती हो गए थे| 19 वर्ष की आयु में उन्हें पहले विश्व युद्ध में कामनवेल्थ देशों से लड़ने का मौका मिला और उन्हें फ्रांस भेजा गया| वहां गब्बर सिंह को अपनी अद्वितीय बहादुरी और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए तथा अपने दल के साथ सराहनीय काम करने के लिए ब्रिटेन का सर्वोच्च पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस दिया गया|

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गजेंद्र सिंह बिष्ट:

२००9 में भारत की धरती पर सबसे भयावह आतंकवादी हमलों में से एक 26/11 के आतंकवादी हमले में, 166 लोग मारे गए थे और 300 से ज़्यादा घायल हो गए थे, जब पाकिस्तान से दस भारी-सशस्त्र आतंकवादियों ने मुंबई में अरब के सागर के रास्ते घुसकर हिंसा फैलाई। हवालदार गजेंद्र सिंह बिष्ट (36) एक एनएसजी कमांडो थे जो 2008 के मुंबई हमलों के दौरान ऑपरेशन ब्लैक टर्नाडो का हिस्सा थे। वह वास्तव में एक अज्ञात नायक थे जिन्होंने रणभूमि में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए| उन्हें 26 जनवरी 2009 को उनके बहादुर कार्यों के लिए अशोक चक्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली:

वीरचंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म 24 दिसंबर 1897 को ग्राम मेसन में, पट्टी चाथान, तहसील थलीसैण जिला पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। बचपन से चन्द्र सिंह बलवान थे और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, वह ब्रिटिश भारतीय सेना के 2/39 गढ़वाल राइफल में शामिल हो गए और सहयोगी सेनाओं के लिए यूरोप में युद्ध लड़ा। 3 अप्रैल 1930 को पेशावर में किस्साखानी बाजार पुलिस चौकी के सामने हजारों पठान इकट्ठे हुए और राष्ट्रीय ध्वज को वहां लहराया गया|

गढ़वाल रायफल्स के जवान पठानों के सामने खड़े थे और सैकड़ों लोग अपने घरों और छत के ऊपर से देख रहे थे। क्रोधित अंग्रेज कमांडर के आदेश देने के बावजूद भी गढ़वाली सैनिकों ने जमीन पर अपनी राइफलों को रख दिया। बीच में से चंद्र सिंह गढ़वाली की दमदार आवाज़ गूंजी यह बताने के लिए कि की वे निहत्थे लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे, भले ही कप्तान उन्हें गोली मार दें। ऐसे साहस का अद्भुत प्रदर्शन करने वाले वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गए। इस घटना के बाद में, गढ़वाली और उनके साथियों को एबटाबाद में गिरफ़्तार कर रखा गया था, उन्हें विद्रोह के लिए दोषी ठहराया गया। हालांकि वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को वीरता पुरस्कार तो नही मिला किन्तु गांधी जी ने  एक बार उनकी तारीफ़ में कहा था “यदि मेरे पास एक और चंद्र सिंह गढ़वाली होता, तो भारत बहुत पहले ही स्वतंत्र हो गया होता।” और यह किसी पुरस्कार से कम नहीं|

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The Indian who earned Britain’s highest gallantry award “victoria cross”

स्वंतंत्रता संग्राम में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की भूमिका | जब गाँधी जी ने भी की थी तारीफ़

26/11 के मुंबई हमले में उत्तराखंड के इस वीर सपूत को मिला था “अशोक चक्र” | पूरी जानकारी

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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