चिपको वुमन के नाम से मशहूर है गौरा देवी, पढ़िए इनके बारे में

“भाइयों ये जंगल हमारी प्रकृति माता के घर के जेसा है यहाँ से हमें फल, फूल, सब्जियां आदि मिलती हैं अगर यहाँ के पेड़ पौधों को काटोगे तो निश्चित ही बाढ आएगी।” चिपको आन्दोलन के कुछ सालों बाद एक इंटरव्यू में यह कहने वाली गौरा देवी थी।

गौरा एक निर्भीक और साहसी महिला थी। उन दिनों पहाड़ों में पेड़ कटान अपने  चरम पर था। सरकार पेड़ चिन्हित करके ठेकेदारों को पेड़ काटने का टेंडर दिया करती थी। देवदार वृक्ष के लकड़ी काफी महंगी हुआ करती थी जो सरकार और ठेकेदारों के लिए अच्छी कमाई का साधन थी। पहाड़ो में उस समय अधिकतर लोग कृषि और जंगलों पर ही निर्भर हुआ करते थे, ऐसे में पेड़ो का कटान चिंता का विषय था, बहुत से प्रयावरणविद इसका विरोध कर रहे थे। किन्तु गौर देवी ने जो तरीका सुझाया वो संपूर्ण भारत वर्ष में आग की तरह फ़ैल गया।

गौर देवी का जन्म सन 1925 में चमोली जिले के लाता गाँव में हुआ था। गौरा बचपन से ही तेज और कुशल बालिका थी। गौरा भले ही जाड नहीं पढ़ पायी किन्तु उन्हें वेदों और पुराणों की साड़ी जानकारी थी। उन्होंने कक्षा 5वीं तक पढाई करी जिसके बाद उनका विवाह 12 वर्ष की आयु में रेणी गाँव के मेहरबान सिंह से हुई। मेहरबान सिंह खेती करने के साथ साथ पशु पालन, भारत तिब्बत सीमा में व्यापार किया करता था। शादी के 10 वर्ष बाद ही मेहरबान सिंह का देहांत हो गया उस समय उनका पुत्र चन्दन सिंह मात्र ढाई साल का था। गौरा पर पुत्र के पालन पोषण, वृद्ध सास ससुर की देखबाल, खेती बाड़ी और व्यापार का सारा भार आ गया। अनेक कठिनाईयों के वावजूद गौरा ने वह सब किया जो एक माँ और बहु को करना चाहिए। उन्होंने अपने पुत्र को एक मेहनतकश और स्वाभलम्भी इंसान बनाया।

1962 में भारत तिब्बत व्यापार बंद हो जाने के बाद गौर देवी और उनके पुत्र ने उन का कारोबार और मजदूरी कर अपनी आजीविका चलाई। 1970 में गोपेश्वर चमोली के मंडल ब्लाक से प्रयावरण के प्रति लोगो में जागरूकता फैली जिसका मुख्य श्रेय चंडी प्रसाद भट्ट को जाता है। पहाड़ के लोग प्रयावरण को बचाने के लिए सजग होने लगे थे।

तबतक गौरा देवी अपने गाँव और आस पास के इलाके में चिर परिचित चेहरा बन गयी थी और 1972 में गौरा महिला मंगल दल की अध्यक्ष बन गयी। उसके बाद कई पर्यावरण विद जेसे चंडी प्रसाद भट्ट, हयात सिंह, गोविन्द सिंह रावत उस क्षेत्र में आये जिनका प्रभाव गौरा देवी पड़ने लगा।

जनवरी 1974 में रेणी गाँव के 2459 पेड़ो को काटने के चिन्हित किया गया। जिसका विरोध करने के लिए गौर देवी के नेतृत्व में इलाके की महिलाओं ने पेड़ को गले लगाना शुरू कर दिया उनकी जिद थी की यदि पेड़ काटना ही है तो उनके पहले काट दिया जाए। महिलाओं का यह रूप देख ठेकेदार कुछ ना कर पाए। उसके बाद चिपको आंदोलन ने तो जेसे रफ़्तार ही पकड़ ली, यह आन्दोलन आग की तरह फ़ैल गया। उसके बाद मार्च 1973 में ही महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में ही गोपेश्वर आयोजित रैली में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। इसके बड़ा से ही गौरा देवी चिपको वुमन के नाम से मशहूर हो गयीं। गौरा ने इसके बाद भी प्रयावरण के लिए अनेक सराहनीय योगदान दिए।

गौरा देवी का निधन 66 वर्ष की आयु में 04 जुलाई 1992 को हुआ। भले ही आज गौरा देवी जीवित नहीं हैं किन्तु उनका नाम सदा के लिए उत्तराखंड के इतिहास में अंकित हो गया है।

 

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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