राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की चीन युद्ध की कहानी

जसवंत सिंह रावत 4 गढ़वाल राइफल्स, उत्तराखंड के एक भारतीय राइफलमेन सिपाही थे जिन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश में नूरानंग की लड़ाई में मरणोपरांत महा वीर चक्र जीता था। उनका जन्म 1 9 अगस्त, 1 9 41 को श्री गुमान सिंह रावत के घर में गांव बैरुन, पौड़ी गढ़वाल में हुआ था।

जसवंत रावत को स्थानीय लोगों द्वारा एक पवित्र बाबा के रूप में माना जाता है, जो उस इलाके पर निगरानी रखते है और उस क्षेत्र की सुरक्षा करते है। उस जगह पर एक स्मारक भी बनाया गया है जहां उन्होंने लड़ाई लड़ी और अब उस जगह को जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है। इस मार्ग से जो कोई भी गुजरता है, जनरल से लेकर जवान सभी यहां उन्हें  सम्मान देते हैं और माथा टेकते हैं।

ऐसा माना जाता है जैसे वे अभी भी जीवित है, रोजाना उनके बूट पोलिश किये जाते हैं, कपडे धुले और स्त्री किये जाते हैं और बिस्तर बनाया जाता है|। अक्सर उन्हें जुटे कीचड़ में सने पाए जाते हैं, मानो वे रात भर चले हों। सुबह उनका बिस्तर देख भी ऐसा लगता है जैसे कोई सोया हो| यह भी जाता है कि बर्फीले तूफ़ान में फसे गाड़ियों के काफिले ने जसवंत को तीखे मोड़ों पर वाहनों को निर्देशित करते देखा है। उनकी मृत्यु के बाद भी वे समय पर पदोन्नति प्राप्त करते हैं।

हुआ क्या था:

4 गढ़वाल राइफलों को पीछे हटने के आदेश दिए गए थे लेकिन राइफलमैन जसवंत सिंह अपने जगह पर बने रहे और  तीन दिनों तक चीनी सैनिकों का सामना किया।

कुछ जगह यह बताया जाता है कि जसवंत सिंह की सहायता सेला और नूरा नामक दो लड़कियों ने की थी, जबकि कुछ लोग कहते हैं कि गांव की महिला “बूम ला” थी। इन लड़कियों ने ही जसवंत को खाना पानी पहुँचाया | बाद में आस पास के पहाड़ियों का नाम सेला और नूर रख दिया गया| जसवंत सिंह ने कई जगहों पर इस तरह से बंदूक रखी थी कि चीनी को यह लगा कि उस पोस्ट पर कई सैनिक हैं लेकिन तीन दिनों के बाद जब चीनी को यह पता चला कि केवल एक व्यक्ति पोस्ट की रखवाली कर रहा था और उन्हें छका रहा था तो चीनी सैनिक गुस्से में आ गए। नाराज चीनीयो ने पीछे और सामने दोनों तरफ से हमला किया, और इस फायरिंग में जसवंत सिंह के सिर पर गोली लगी और मातृभूमि की रक्षा में उन्होंने प्राण त्याग दिए। उन्होंने युद्ध में 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मार डाला|

चीनी इतने गुस्से से गुस्सा थे कि उन्होंने उनका सर काट डाला और वापस चीन अपने साथ ले गए| जसवंत सिंह की बहादुरी से प्रभावित  चीनी सैनिकों ने युद्धविराम के बाद, जसवंत सिंह का सर पीतल के धड के साथ समान्पूर्वक लौटा दिया।

 

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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