तैमुर लंग की सेना के दांत खट्टे कर दिए थे कुमाऊँ की रानी लक्ष्मी बाई “जिया रानी” ने, पढ़िए इनकी कहानी

जिया रानी हरिद्वार(मायापुर) के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थी। उनके बचपन का नाम मौला देवी था। उस समय मध्य भारत में तुर्कों का राज था। तुर्क राजा संपूर्ण भारत पर राज करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कई बार उत्तराखंड पर आक्रमण किये। उस समय हरिद्वार पर मौला देवी के पिता अमरदेव पुंडीर राज कर रहे थे। तुर्क आक्रमण के दौरान राजा अमरदेव पुंडीर ने पृथ्वीपाल उर्फ़ प्रीतमदेव से सहायता मांगी जिसके जवाब में राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ भेजा। दो साल तक हरिद्वार पर पुंडीर राज कायम रहा। इसके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमायूं के राजा प्रीतमदेव उर्फ़ पृथ्वीपाल से कर दिया। पृथ्वीपाल कत्युरी वंश के राजा थे। मौला देवी को तीन पुत्र हुए धामदेव, ब्रह्मदेव और दुला।  मौला देवी राजा प्रीतमदेव की दूसरी पत्नी थी। मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला और उस क्षेत्र में माता को जिया कहा जाता था(आज भी कुमाऊँ में माता को इजा कहा जाता है) इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया। कुछ समय बाद जिया रानी अपने पुत्र के साथ गोलाघाट चली गयी जहाँ जिया रानी 12 साल तक रही। वहीँ उन्होंने एक खूबसूरत बाग़ भी बनवाया, जिसका बाद में नाम रानी बाग पड़ा

उस समय दिल्ली में तुगलक वंश का शासन था। भारत के स्वर्ण से आकृष्ट मध्य एशिया का शासक तैमुर लंग ने भारत की महान्‌ समृद्धि और वैभव के बारे में बहुत कुछ बातें सुन रखी थीं। अत: भारत की दौलत लूटने के लिये ही उसने आक्रमण की योजना बनाई थी। दिल्ली में फिरोज शाह तुगलक के निर्बल वंशज शासन कर रहे थे। इसी बात का फायदा उठा कर तैमुर लंग ने भारत की तरफ चढ़ाई कर दी। दिल्ली मेरठ को फतह करता हुआ वो हरिद्वार पहुंचा जहाँ उस समय वत्सराजदेव पुंडीर शासन कर रहे थे, उन्होंने वीरता से तैमुर का सामना किया किन्तु शत्रु की विशाल सेना के सामने वो टिक ना सके। तैमुर जहाँ भी जाता वहाँ भयानक नरसंहार करता और सब तहस नहस कर दिया करता था।  ऐसा ही कुछ हरिद्वार में भी हुआ। भयानक नरसंहार और धर्मंपरिवर्तन ने हरिद्वार और पुंडीर राजवंश को झकझोर दिया। मजबूरन राज परिवार को नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी वहां उनके वंशज आज भी रहते हैं और मखलोगा पुंडीर के नाम से जाने जाते हैं।

वहां कत्युरी राजा प्रीतमदेव को इस बात की खबर मिली तो वो सेना लेकर हरिद्वार पहुंचे और उनकी सहायता करने लगे। इसके बाद प्रीतम देव जिया रानी के साथ पिथोरागढ़ आ गये, कुछ समय बाद राजा प्रीतम देव की मृत्यु हो गयी और धामदेव को राज्य का कार्यभार दिया गया किन्तु धाम देव की अल्पायु की वजह से जिया रानी को उनका संरक्षक बनाया गया। कहा यह भी जाता है की जिया  रानी ही सारे निर्णय लिया करती थी।

जब तैमुर की सेना ने हरिद्वार पर आक्रमण किया था तो उसने एक सेना की टुकड़ी पहाड़ो की तरफ भी भेजी। जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने इसका सामना करने के लिए कुमायूं के राजपूतो की एक सेना का गठन किया, चूंकी राजा प्रीतम देव हरिद्वार मदद के लिए गए थे तो रानी ने ही सेना की कमान संभाली। तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच रानीबाग़ क्षेत्र में युद्ध हुआ जिसमे मुस्लिम सेना की हार हुई। तैमुर की अपराजित सेना का यह हाल देख रानी के सेना निश्चिंत हो गयी इसी बात का फायदा उठाते हुए दूसरी अतिरिक्त सेना जो की पहली सेना की मदद के लिए आई थी ने जिया रानी की सेना को परास्त कर दिया। सतीत्व की रक्षा के लिए रानी एक गुफा में जाकर छिप गयी। इस बात की खबर मिलते ही राजा प्रीतम देव रानी की सहायता करने वापस आ गये और शत्रु को मार भगाया।

कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल उर्फ़ प्रीतम देव की पत्नी रानी जिया एक बार चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही मुस्लिम सेना ने उन्हें घेरा दिया। रानी जिया एक शिव भक्त और सती महिला थी। खतरे का एहसास होते ही जिया रानी गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। मुस्लिम सेना ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे उन्हें खोज ना पाए। कहते हैं, उन्होंने स्वयं को अपने घाघरे में छिपा लिया था और उस घाघरे के आकार में ही शिला बन गई थीं। आज भी गौला नदी के किनारे एक ऐसी ही शिला है, जिसका आकार घाघरे के समान हैं। उस शिला पर आज भी रंग-विरंगे पत्थर चमकते रहते है। आज भी ऐसा लगता है जेसे  किसी ने रंगीन घाघरा वहन पर रख दिया हो। वह रंगीन शिला को जिया रानी का स्वरुप माना जाता है और कहा जाता है कि  जिया रानी ने इस शिला का ही रूप ले लिया था। रानी जियाने यहीं रानी बाग भी बनवाया था और उन्हें यह स्थान बहुत प्यारा था। अपनी अंतिम सांस तक वह अपने सतीत्व की रक्षा करती रहीं और ऐसा करते हुए उन्होंने अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए। भले ही वह सदा के लिए चली गई परन्तु आज भी उस शिला के रूप में हमे सीख देती रहती हैं।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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