इतिहास में उत्तराखंड का इन नामों से है उल्लेख

उत्तराखंड का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना संपूर्ण भारतवर्ष  का है। उत्तराखंड हमेशा से ही भारतीय संस्कृति से जुड़ा रहा है।

इसका प्रमाण पौराणिक वेदों और ग्रंथों से भी मिलता है। वेदों और अलग अलग ग्रंथों में उत्तराखंड का उल्लेख अलग अलग नामों से किया गया है। कुछ नाम जिनका उपयोग उत्तराखंड के लिए किया गया है इस प्रकार से हैं:

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  • ऋग्वेद में उत्तराखंड को देवभूमि या मनीषियों की पूर्ण भूमि कहा गया है।
  • एत्रब्रह्मान में उत्तराखंड के लिए उत्तर कुरु क्षेत्र नाम का उपयोग किया गया है।
1. kaalsi
  • स्कन्दपुराण में कुमाऊँ के लिए मानसखंड और गढ़वाल के लिए केदारखंड लिखा गया है एवं दोनों राज्यों की सीमा नंदादेवी पर्वत को माना गया था।
  • पुराणों में गढ़वाल और कुमाऊँ को संयुक्त रूप से खसदेश, ब्रह्मपुर, उत्तर-खंड आदि नामों से उल्लेख किया गया है।
  • पाली भाषा में लिखा गया बोध साहित्य में उत्तराखंड को हिमवंत कहा गया है।

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  • गढ़वाल के लिए महाभारत इत्यादि ग्रंथों में बद्रिकाश्रम, तपोभूमि, स्वर्गभूमि आदि नामों का उपयोग किया गया है। वहीं कुमाऊँ के लिए पूर्वांचल नाम का उपयोग किया गया है।
  • पुराणों में ज्यादातर कुमाऊँ के लिए कण्वाश्रम और गढ़वाल के लिए बद्रिकाश्रम उपयोग किया गया है।
  • सम्राट अशोक के पाली भाषा में लिखे गये कालसी में मौजूद अभिलेख में लिखा गया है की मगध की उत्तरी सीमा उत्तराखंड तक फैली हुई थी और यहाँ के लोगों को पुलिंद कहा गया है और उत्तराखंड को अपरांत कहा गया है।
  • बाणभट्ट के द्वारा लिखा गया हर्षचरित्र में उत्तराखंड को ब्रह्मपुर और हरिद्वार को मयुरपुर कहा गया है।
  • राजा हर्ह्वर्धन के राज में चीनी यात्री व्ह्वेन शान भारत आया था और अपनी किताब सी यु की में उत्तराखंड को पो-ली-ही-मो-पु-ली कहा है और हरिद्वार को मो-यु-लो कहा है।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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