उत्तराखंड के इस नृत्य को मिला है विश्वधरोहर का दर्जा | रम्माण

चमोली जिले के सालूर डूंगरा गाँव में होने वाले नृत्य रम्माण को यूनेस्को ने हाल ही में सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है| उत्तराखंड सांस्कृतिक विविधता से भरा हुआ प्रदेश है किन्तु उत्तराखंड के लिए यह पहली बार हुआ है कि किसी सांस्कृतिक विरासत को इतना बड़ा सामान मिला हो, चाहे हम इसे नाकामी बोले या नजरंदाजी बोले, उत्तराखंड की संस्कृति खतरे में है |

रम्माण एक तरह का त्यौहार होता है जिसे सालूर डूंगरा के ग्रामीण पांडव नृत्य की तरह मनाते है| आमतौर पर यह त्यौहार या नृत्य बैसाखी के बाद, अप्रैल के महीने में मनाया जाता है| इस समय भूमिया देवता या भूमि क्षेत्रपाल की डोली पुरे गाँव में घुमाई जाती है और रम्माण के लिए बाहर लायी जाती है, रम्माण के बाद भूमिया देवता अपने स्थान पर वापस चले जाते हैं|

रम्माण, जैसा कि नाम से पता चलता है, रामायण से संबंधित है, जिसका प्रदर्शन इस उत्सव में किया जाता है। गांव में नकाब पहन कर ग्रामीण रोजमर्रा की जिंदगी के विभिन्न रंगों और हिंदू महाकाव्य रामायण का पाठ खेलते है । त्योहार विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा से शुरू होता है,  विभिन्न जातियों के ग्रामीणों इस त्योहार में बिना किसी भेद भाव के अपनी अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं। इस नृत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है ‘जागर’। यह माना जाता है कि ये प्रदर्शन केवल देवताओं की पूजा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि भगवान नाटककार व्यक्ति जो उनका किरदार निभा रहा होता है, पर अवतरित होते हैं और अपनी भूमिका निभाते हैं।

source: merapahadforum.com

हाल ही में यूनेस्को ने रम्माण पर एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई जिसे आप यहाँ देख सकते हैं| यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट पर भी आप इसके बारे में भी पढ़ सकते हैं|यूनेस्को ने रम्माण को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है जो वाकई चिंता का विषय है|

हमारी गढ़वाली, कुमाउनी और जौनसारी संस्कृति वाकई लुप्त होने की कगार पर है| हमारे उत्तराखंड के कई ऐसे त्यौहार और रीती रिवाज है जो वाकई लुप्त हो चुके हैं| जब तक उत्तराखंड के कई मुद्दे अनसुलझे रहेंगे हमारी संस्कृति लुप्त होती रहेगी| अनेक समस्याओं में प्राय: उत्तराखंड की भाषाओ को अनुछेद 8 के अन्दर भाषा का दर्जा न मिलना और पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में ना होना आदि है जिनके समाधान से वाकई हमारी संस्कृति के लुप्तीकरण को रोका जा सकता है|

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PRIYANSHU JAKHMOLA

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