इन्होने किया गाँधी जी के साथ पहाड़ के लिए काम, मिस केथरीन हेलिमेन- सरला बहन

“सुनो केथरीन, ये निर्धारित किया गया है की तुम्हारा परिवार दुश्मन के साथ है और न ही तुम युद्ध में उपयोगी साबित होंगी तो तुम्हे छात्रवृति नहीं मिल सकती।” एक अध्यापक के मुह से ऐसी बात सुन कर बालिका केथरीन स्तब्ध थी।

मिस केथरीन हेलिमेन या सरला बहिन समाज में नारी उत्थान और पर्यावरण के क्षेत्र में निभाई गयी अपनी भूमिका के जानी जाती हैं। उत्तराखंड और खासतौर पर कुमाऊँ में इन्होने नारी उत्थान के लिए अहम योगदान दिया। इनको सरला नाम गांधीजी ने स्वयं दिया था। भारत में अपने शुरुवाती सालों में ये स्वतंत्रता आन्दोलन से जुडी रही और इन्होने पहाड़ में लोगों में स्वराज के लिए जागरूगता फैलाई। इन्होने देखा की पहाड़ की महिला पुरुषों के मुकाबले काफी पिछड़ी हुई थी जब उन्होने इसका कारण जानना चाहा तो एक महिला ने कहा था की “बहिन हम तो जानवर है बस अपने काम से काम रखते हैं “ यह बात सुन सरला बहन को लगा कि वाकई पहाड़ में महिलाओं को जागरूक करने की जरुरत है। और उन्होंने लक्ष्मी आश्रम का निर्माण करवाया और नारी उत्थान के लिए काम करना शुरू कर दिया।

केथरीन का जन्म लन्दन में हुआ था और उसके पिता जर्मन मूल के और माता अंग्रेजी मूल की थी। इसी वजह से लन्दन में उन्हें आये दिन जातिवाद का सामना करना पड़ता था। लन्दन में क्लर्क की नौकरी करते हुए उनकी मुलाकात कुछ भारतीय छात्रों से हुई जिन्होंने उन्हें गाँधी जी के बारे में बताया। गांधी जी से वह इतना प्राभावित हुई की उन्होंने इंग्लैंड छोड़ दिया और भारत आई।

उन्होंने दो साल तक उदयपुर में एक स्कूल में पढाया किन्तु वह वहां संतुष्ट नहीं थी और गांधी जी से मिलना चाहती थी। उस समय तक वह संपूर्ण रूप से स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ गयी थी और वह वर्धा में स्थित गांधी जी के आश्रम चले गयी और वहां 8 साल तक रहीं। वहां उन्होंने स्वराज के लिए काम भी किया। उन्हें एक साल मलेरिया हो गया तब बापू ने उन्हें उत्तराखंड जाने की सलाह दी क्योंकि कथरिन गर्मी में नहीं रह पा रही थी । कौसानी आने के बाद सरला बहन ने स्वतंत्रता आंदोलन से लगातार जुडी रहीं और इस बीच वह दो साले के लिए लखनऊ और अल्मोडा जेल में दो साल की सजा भी काटी। यहाँ उन्होंने कस्तूरबा महिला उत्थान मंडल का निर्माण करवाया जिसका नाम लक्ष्मी आश्रम पड़ गया वहां उन्होंने लडकियों को न सिर्फ शिक्षा प्रदान करवाई अपितु उन्हें मौलिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया।

सरला बहन ने पर्यावरण के लिए भी सराहनीय काम किया। वो कुमाऊँ में चिपको आंदोलन से भी जुडी रहीं और चंडी प्रसाद भट्ट जेसे पर्यावरण विदों से भी जुडी रहीं। उन्होंने वहां लोगो में पर्यावरण के लिए जागरूकता फैलाई।

उत्तराखंड में उत्तराखंड सर्वोदय मंडल की नीव भी सरला बहन ने ही राखी जिसका मुख्य उदेश्य नारी उत्थान, शराब विरोध, जंगल के अधिकारों को स्थापित करना और रोजगार को बढावा देना है।

उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार से समानित भी किया गया था और पुरस्कार राशि को उन्होंने अपने आश्रम में गरीब बालिकाओं के उत्थान के लिए लगाया।

1982 में धर्म घर, पिथोरागढ़ में उनकी मृत्यु हो गयी। लक्ष्मी आश्रम और सर्वोदय कार्यकर्ता आज भी उनकी पुण्यतिथि पे एकत्रित होते है और उनको नमन करते है।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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