पहाड़ के शराब विरोध आन्दोलन में रहा “टिन्चरी माई” का महत्वपूर्ण योगदान, पढिये इनके बारे में

1940-50 के दशक तक प्रदेश के किसी भी परिवार में शराब पीने वाला नहीं था। 1861 में तत्कालीन कुमाऊं के सीनियर कमीश्नर गाइल्स ने आबकारी प्रशासन की रिपोर्ट में लिखा था कि पर्वतीय लोग नशे के व्यसन से मुक्त हैं। हालांकि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कुछ जनजातियों के बनाए विशेष तरल नशे के प्रयोग भी बात जरूर कही थी। (स्रोत: दैनिक जागरण)

60 के दसक से उत्तराखंड में शराब का प्रचलन शुरू हुआ। गढ़वाल में आयुर्वेदिक दवा के नाम पर बिकने वाली शराब टिन्चरी और कुमाऊँ में कच्ची का प्रचलन था। महिलाओं में शराब को लेकर बहुत गुस्सा था और टिन्चरी माई के नेतृत्व और पहल पर यह गुस्सा आन्दोलन का रूप ले चूका था।

दीपा देवी (माई) का जन्म 1917 में थलीसैण क्षेत्र के मंज्युर गाँव में हुआ और उनका विवाह गवाणी गाँव के हवलदार गणेश राम से हुआ। गणेश राम अपनी पत्नी को बहुत प्यार देते थे।  द्वितीय विश्वयुद्ध में उनके पति हवलदार गणेश राम शहीद हो गये। 19 वर्ष की दीपा को लन्स्दोव्ने भेज दिया गया। मायके से भी उन्हें कोई मदद न मिली तो ससुराल से तिरस्कृत दीपा ने उस दिन जोगन बन्ने की ठान ली। दीपा को पहने लिखने का बहुत शौक था उनका यह सपना भले ही पूरा नही हो पाया पर उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए काम करने की ठान ली थी। माई बहुत मजबूत और दृढ निश्चय वाली महिला थी। माई किसी से डरती नही थी जेसा उन्हें लगता बोल देती शायद इसी वजह से उन्होंने दवाई के नाम पर बिकने वाली शराब टिन्च्री को बंद करवाने के लिए आवाज उठाई।

माई ने कोटद्वार के पास मोटाढांक में जोगन होने के वावजूद स्कूल भी बनवा दिया था। पहले यह स्कूल बालिकाओं के लिए ही था किन्तु बाद में इसे हाईस्कूल तक कर दिया गया।

माई ने एक बार एक टिन्चरी की दूकान पर आग भी लगा थी वह दूकान दारु का अड्डा बन गयी थी और गुस्से में माई ने दूकान पर आग लगा दी। दूकान पर आग लगा कर माई ने स्वयं ही डिप्टी कमिसनर के बंगले पर जाकर गिरफ्तारी दे दी। यह खबर आग की तरह फ़ैल गयी। और इचागिरी माई के नाम से मशुर माई का नाम टिनचरी माई पड गया। नशे के खिलाफ माई का अभियान उसके बाद भी जारी रहा। बच्चों की शिक्षा विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा के लिए स्कूलों  का निर्माण कराने में भी इनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा। माई ने पहाड़ के लिए जो किया उसे भुलाया नहीं जा सकता। टिंचरी माई का निधन 75 साल की उम्र में 1992 में  हो गया। ऐसी महान महिला को हमारा शत शत नमन ।

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PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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