5 बचपन की यादें, जो ले जाएंगी हर पहाड़ी को वापस बचपन में

आजकल का बचपन स्मार्ट फ़ोन, कंप्यूटर आदि टेक्नोलॉजी में शायद कहीं खो गया है| पुराने दिन भी क्या दिन थे जब बच्चे कोदा झंगोरा खा कर भी खुश रहते थे| टॉफ़ी, चॉकलेट तब भी थी लेकिन उनकी लालसा बचपन पर कभी हावी नहीं हो पायी| आज हम ऐसे ही कुछ यादगार लम्हे आपके साथ बांटना चाहते हैं, जिन्हें पढ़ निश्चित ही आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी|

कढाई में खाना:

हर पहाड़ी ने यह जरुर किया होगा| बचपन में हम सब ने माँ के लाख मना करने पर भी कढाई या किसी अन्य भोजन पकाने वाले बर्तन में खाया जरुर होगा| माँ का कहना होता था कि कढाई में मत खा! शादी में बारिश आ जाएगी बल!

पूड़ी या पीठा खेलना:

snap from: ghughuti basuti, song by pandavaas

हर पहाड़ी का बचपन पीठा खेलते हुए जरुर बीता होगा| पीठा या पूड़ी की गेंद किसी पुराने जुराब से बनाई जाती थी| खेतो में “बैट-बॉल” (क्रिकेट) खेलने का भी प्रबंध किया जाता था| अलग अलग खेतो के लिए अलग अलग रन| वाह क्या दिन थे वो!

पेड़ पर से चोर कर फल खाना:

आडू, अमरुद, मालते, सहतूत और भी ना जाने क्या! कुछ भी दिख जाए फिर उनका पेड़ में बचना मुश्किल हो जाता था| हर बचे ने यह किया होगा| जंगल जा कर काफल, हिंसर आदि खाने का भी अलग ही आनंद हुआ करता था|

गदेरों में नहाना और मछली पकड़ना:

गदेरों में भी रोनक हुआ करती थी| मछली पकड़ने के अलग अलग तरीके सिखने को मिल जाते थे| मछली पकड़ने गए बच्चे तो कभी किनारे पर ही चुल्हा बना मछली पका लेते थे| खक्सा के पत्तो में मछली पकाई जाती थी, जिसका स्वाद अपने आप में अनूठा होता था|

घुघूती बसुती:

शायद ही कोई ऐसा पहाड़ी हो जिसने घुघूती-बसुती ना खेला हो| घुघूती बसुती कोई बड़ा किसी रोते हुए बच्चे को खुश करने के लिए गाता था, पैरों पर उठते हुए जो रोमांच वह नन्ही जान महसूस करती होगी, वही शायद हर पहाड़ी के बचपन से साहसी और एडवेंचरस बनाता है| बचपन में सबसी मीठी यादों में एक यही है, जिसे सुन आज भी मन आनंदित हो उठता है| बचपन का यह अविष्मरणीय अहसास छूटे नही छुट सकता!

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About the Author

PRIYANSHU JAKHMOLA

A "not at all serious" engineer, a technophile and a philanthropist. Knows 'f' of "few", wants to share it and grow it. Loves travelling and loves pahadi food.

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